काहिरा : मिस्र के विदेश मंत्री ने कहा कि सऊदी अरब का समर्थन करने के लिए संसद का प्रस्ताव यमन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में मिस्र की सेना भेजने का आदेश नहीं है।
मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्दुलआती ने रविवार को स्पष्ट किया कि सऊदी अरब को सैन्य समर्थन देने के लिए संसद से मिली मंजूरी का मतलब यह नहीं है कि मिस्र यमन के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए अपनी सेना भेजेगा।
अरबी समाचार चैनल ‘स्काई न्यूज’ से बातचीत में अब्दुलआती ने कहा कि मिस्र यमन में शांति स्थापित करने और पहले हुए समझौतों पर लौटने के लिए प्रयास कर रहा है।
पिछले सोमवार को मिस्र की संसद ने राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी को सऊदी अरब के समर्थन और मदद के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार देने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस प्रस्ताव पर संसद के तीसरे बंद कमरे में हुए सत्र के दौरान मतदान किया गया था।
मिस्र की संसद के इस फैसले पर यमन की सर्वोच्च राजनीतिक परिषद के सदस्य मोहम्मद अली अल-हूसी ने चेतावनी दी थी कि मिस्र की सेना को यमन के खिलाफ युद्ध में शामिल करना मिस्र के लिए भारी नुकसानदेह होगा।
उन्होंने कहा था कि ऐसा कदम मिस्र की सैन्य ताकत को कमजोर करेगा और इस्राईल की उन योजनाओं को मदद पहुंचा सकता है, जिनका मकसद सिनाई पर हमला करना है।
कई विश्लेषकों का मानना है कि मिस्र की संसद का यह प्रस्ताव मुख्य रूप से राजनीतिक और प्रचार से जुड़ा कदम है। उनके मुताबिक, मिस्र सरकार शायद दूसरी बार यमन के युद्ध में फंसना नहीं चाहती।
गौरतलब है कि 1962 से 1970 के बीच यमन के गृहयुद्ध के दौरान मिस्र ने वहां करीब 70 हजार सैनिक भेजे थे। रिपोर्ट के अनुसार, इस युद्ध में मिस्र को भारी हार का सामना करना पड़ा और उसके लगभग 10 हजार सैनिक मारे गए। इसके बाद मिस्र को यमन से अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी थी।
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